यह भागलपुर की पुलिस है, आपकी सेवा में नहीं, आपकी पिटाई में रहता है तत्पर

यह भागलपुर की पुलिस है, आपकी सेवा में नहीं, आपकी पिटाई में रहता है तत्पर

भागलपुर । खाकी पर दाग लगा बैठी भागलपुर पुलिस अपनी मनमर्जी करने से बाज नहीं आ रही। होली की रात लघु सिंचाई कर्मी संजय कुमार को जमकर पीटा। उसकी मौत हो गई तो परिजनों ने पुलिस पर आरोप लगाया। इस आरोप से पुलिस अभी निकल भी नहीं पाई थी कि गुरुवार देर रात स्टेशन पर पुलिस के कुछ जवान दबंगई पर उतर आए। होम गार्ड और पुलिस के जवानों ने असानंदपुर के जोहर अंसारी को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। मोबाइल चोरी के आरोप में मो. जोहर अंसारी पर डंडे बरसाए, सवाल-जवाब किए। अंसारी की जेब से मोबाइल तो नहीं निकला, लेकिन उसके मुंह से वेदना की पुकार जरूर निकली। दरअसल, असानंदपुर का जोहर अंसारी अपने घर से किसी बात पर खफा होकर निकला था। वह स्टेशन चौक पहुंच गया। उसकी जेब में 1500 रुपए थे और वह इधर-उधर सड़क पर टहल रहा था। इसी बीच खाकी की ताकत से सराबोर कुछ जवान और होमगार्ड जवान भी पहुंचे। उन्होंने पहले तो जोहर से कुछ बात की। सूत्रों की माने तो किसी अन्य ने पुलिस से मोबाइल चोरी की बात बताई थी। इसके लिए जोहर को पुलिस संदिग्ध मान रही थी। पूछताछ के दौरान ही अचानक जोहर भागने लगा। पुलिस ने उसका पीछा किया और डंडे फेंक मारे।
पकड़ा तो जोहर लगा गिड़गिड़ाने
भागते जोहर को लोगों ने पकड़ा तो वह गिड़गिड़ाने लगा। उसने कहा, वह सिर्फ पुलिस को देखकर डर गया था। वह चोर नहीं है। उसने अपनी जेब भी दिखाई। उसकी जेब से मोबाइल भी नहीं निकला। जोहर अंसारी ने बताया, मैं वर्दी देखकर डर गया था। इसलिए भाग रहा था। मैं चोर नहीं हूं। लेकिन पुलिस मुझे चोर बनाने पर आतुर है। मीडिया के कैमरे में पुलिसिया इस गुंडई की हकीकत कैद हुई तो जवानों की बोलती बंद हो गई। पहले तो पिटाई करने वाले जवान ने कहा, मैंने जोहर को नहीं मारा। बाद में कहा, कृपया मीडिया में यह मामला न लाएं।
एएसआई दिखाने लगे अपनी पावर
अपने जवानों को कैमरे में कैद होते और उनकी अवैध हरकतों को देखा तो ट्रैफिक शाखा के एएसआई भी जीप से पहुंचे। उन्होंने पहले तो कहा, जवानों से क्या बात करते हैं? उनके अफसरों से बात करें। फिर जैसे ही उन्होंने मीडिया का कैमरा ऑन देखा। उन्होंने कहा, कैमरा बंद कर लीजिए। कैमरा तो बंद नहीं हुआ, लेकिन कैमरे के सामने एएसआई की जुबां जरूर बंद हो गई। उधर, जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार ने जिन कंधों पर दी, क्या वहीं कंधे जनता को बरारी तक कंधा देने में जुट जाएगी? क्या पुलिस राह चलते लोगों से सम्मान से पेश भी नहीं आ सकती? जबकि नामचीन और हिस्ट्रीशीटर गुंडों की खिदमत में जिम्मेदार कोई कसर नहीं छोड़ते। ऐसे में क्या मान लिया जाए कि पुलिस जनता की नहीं, गुंडों की खिदमतगार है?